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भारतीय महिलाओं में PCOS के अनकहे कारण: एक गहरा विश्लेषण

  • लेखक की तस्वीर: Sneha Parikh
    Sneha Parikh
  • 29 दिस॰ 2025
  • 4 मिनट पठन
भारतीय महिलाओं में PCOS के कारण जैसे तनाव, प्रदूषण, खराब खानपान और हार्मोन असंतुलन दिखाता चित्र
भारतीय महिलाओं में PCOS के छिपे कारणों को दर्शाता विस्तृत मेडिकल इलस्ट्रेशन

भारतीय महिलाओं में PCOS के कारण


भारतीय समाज में स्वास्थ्य पर चर्चा अक्सर रसोई की दहलीज या डॉक्टर के पर्चे तक ही सीमित रह जाती है। लेकिन जब बात 'पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम' (PCOS) की आती है, तो यह केवल एक मेडिकल रिपोर्ट का हिस्सा नहीं, बल्कि एक मूक महामारी का रूप ले चुका है। आँकड़ों के पीछे छिपी सच्चाई यह है कि भारत में किशोरावस्था से लेकर परिपक्व उम्र तक की महिलाएं एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसी हैं, जिसका सीधा संबंध हमारे बदलते परिवेश, खान-पान और मानसिक बुनावट से है। आज हम जानेंगे.भारतीय महिलाओं में PCOS के कारण।


1. इंसुलिन रेजिस्टेंस: भारतीय जेनेटिक्स का पेचीदा पक्ष

भारतीय शरीर क्रिया विज्ञान (Physiology) को समझने वाले विशेषज्ञ जानते हैं कि दक्षिण एशियाई मूल के लोगों में 'इंसुलिन रेजिस्टेंस' की संभावना अधिक होती है। जब शरीर इंसुलिन का सही उपयोग नहीं कर पाता, तो अग्न्याशय (Pancreas) अधिक इंसुलिन बनाने लगता है। यह बढ़ा हुआ इंसुलिन अंडाशय (Ovaries) को अधिक एण्ड्रोजन (पुरुष हार्मोन) बनाने के लिए उकसाता है।

भारतीय खान-पान में कार्बोहाइड्रेट की प्रधानता—जैसे सफेद चावल और मैदा—इस स्थिति को और बिगाड़ देती है। यह केवल वजन बढ़ने की बात नहीं है, बल्कि यह उस कोशिकीय विद्रोह की शुरुआत है जो भविष्य में PCOS का आधार बनती है।


2. 'अदृश्य तनाव' और एड्रिनल ग्रंथियों का बोझ

भारतीय महिलाओं पर अक्सर दोहरी जिम्मेदारी का बोझ होता है—करियर की महत्वाकांक्षा और पारिवारिक अपेक्षाएं। इस सामाजिक ढांचे में महिलाएं अक्सर 'क्रोनिक स्ट्रेस' की स्थिति में रहती हैं। जब मस्तिष्क लगातार तनाव में होता है, तो एड्रिनल ग्रंथियां कोर्टिसोल के साथ-साथ एण्ड्रोजन का स्राव बढ़ा देती हैं।

यह तनाव केवल मानसिक नहीं है; नींद की कमी और स्वयं के लिए समय न निकाल पाना शरीर की प्राकृतिक लय (Circadian Rhythm) को बाधित करता है, जिससे हार्मोनल संतुलन ताश के पत्तों की तरह बिखर जाता है।


3. पोषण का विरोधाभास: अधिक कैलोरी, कम पोषण

भारतीय मध्यम वर्गीय परिवारों में 'कुपोषण' का एक नया रूप देखने को मिल रहा है। हम कैलोरी तो भरपूर ले रहे हैं, लेकिन सूक्ष्म पोषक तत्वों (Micronutrients) जैसे मैग्नीशियम, जिंक और विटामिन-D की भारी कमी है।

भारत की अधिकांश महिलाएं विटामिन-D की कमी से जूझ रही हैं क्योंकि धूप से हमारा संपर्क कम हो गया है। शोध बताते हैं कि विटामिन-D की कमी सीधे तौर पर इंसुलिन संवेदनशीलता और डिंबोत्सर्जन (Ovulation) को प्रभावित करती है, जो PCOS का एक मुख्य कारण है।


4. अंत:स्रावी अवरोधक (Endocrine Disruptors) का बढ़ता जाल

हमारे आधुनिक घरों में प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग, मिलावटी सौंदर्य प्रसाधन और कीटनाशक युक्त सब्जियां 'जेनोएस्ट्रोजेन' (Xenoestrogens) की तरह काम करती हैं। ये रसायन शरीर के असली हार्मोन्स की नकल करते हैं और हार्मोनल रिसेप्टर्स को भ्रमित कर देते हैं। भारतीय रसोई में प्लास्टिक के डिब्बों में गर्म खाना रखना या केमिकल युक्त डिटर्जेंट का उपयोग, अनजाने में ही हमारे अंतःस्रावी तंत्र (Endocrine System) पर प्रहार कर रहा है।


5. गतिहीन जीवनशैली और शहरीकरण का प्रभाव

शहरीकरण ने हमारी शारीरिक मेहनत को न्यूनतम कर दिया है। 'सेडेंटरी लाइफस्टाइल' केवल व्यायाम न करना नहीं है, बल्कि पूरे दिन एक ही मुद्रा में बैठे रहना है। इससे पेल्विक क्षेत्र (Pelvic region) में रक्त संचार कम होता है, जो प्रजनन अंगों के स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)


क्या पीसीओएस केवल उन्हीं महिलाओं को होता है जिनका वजन अधिक है?

नहीं, यह एक बहुत बड़ा भ्रम है। इसे 'लीन पीसीओएस' (Lean PCOS) कहा जाता है, जहाँ महिला का वजन सामान्य या कम होने के बावजूद उसे हार्मोनल असंतुलन और अंडाशय में सिस्ट की समस्या हो सकती है। इसका मुख्य कारण जेनेटिक्स और उच्च तनाव स्तर होता है।


क्या घर का बना शुद्ध शाकाहारी खाना खाने से पीसीओएस से बचा जा सकता है?

सिर्फ घर का खाना काफी नहीं है। यदि आपके भोजन में रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट (जैसे चीनी, मैदा) अधिक है और प्रोटीन व फाइबर कम है, तो पीसीओएस का खतरा बना रहता है। भारतीय शाकाहारी थाली में अक्सर प्रोटीन की कमी होती है, जिसे संतुलित करना अनिवार्य है।


क्या पीसीओएस का मुख्य कारण वंशानुगत या आनुवंशिक है?

हाँ, जेनेटिक्स इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं। यदि आपकी माता या बहन को पीसीओएस या टाइप-2 डायबिटीज है, तो आपकी संभावना बढ़ जाती है। हालांकि, जीन केवल एक 'बंदूक' की तरह हैं, लेकिन उसे चलाने का काम आपकी 'जीवनशैली' (Lifestyle) करती है।


क्या प्लास्टिक के बर्तनों का उपयोग हार्मोन बिगाड़ सकता है?

जी हाँ, प्लास्टिक में बीपीए (BPA) जैसे रसायन होते हैं जो शरीर के प्राकृतिक एस्ट्रोजेन की नकल करते हैं। जब हम प्लास्टिक में खाना गरम करते हैं, तो ये रसायन भोजन में मिल जाते हैं और हार्मोनल असंतुलन पैदा कर पीसीओएस के लक्षणों को बढ़ा सकते हैं।


क्या तनाव सच में पीसीओएस का कारण बन सकता है या यह सिर्फ एक लक्षण है?

तनाव दोनों है—कारण भी और परिणाम भी। अत्यधिक मानसिक दबाव 'हाइपोथैलेमिक-पिट्यूटरी-एड्रिनल' अक्ष को बाधित करता है, जिससे ओव्यूलेशन रुक सकता है और पुरुष हार्मोन्स का स्तर बढ़ सकता है।


निष्कर्ष

PCOS कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे केवल गोलियों से ठीक किया जा सके। यह एक संकेत है कि हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने और अपनी आधुनिक जीवनशैली को संतुलित करने की आवश्यकता है। भारतीय महिलाओं को अपनी सेहत को प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखना होगा। याद रखिए, आपके शरीर की बुद्धिमत्ता (Body Intelligence) बेमिसाल है; इसे बस सही पोषण, विश्राम और सक्रियता की आवश्यकता है।


अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। स्वास्थ्य संबंधी किसी भी समस्या या उपचार के लिए कृपया किसी योग्य चिकित्सक या विशेषज्ञ से परामर्श लें। अपनी मर्जी से कोई भी दवा या डाइट प्लान न अपनाएं।

क्या आप चाहते हैं कि मैं इस लेख में किसी विशिष्ट भारतीय राज्य की जीवनशैली या आयुर्वेदिक दृष्टिकोण पर अधिक विस्तार करूँ?

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स्नेहा पारिख द्वारा

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